Monday, 4 April 2016

भूले से ही

जो बीत गये
वो तेरे
जो साथ जुड़े
वो तेरे
लम्हा भर
जो तू हो साथ
वो वक़्त हो मेरे !
तनहा तो यूँ
जीते आये
सदियाँ !
आज दिखा
वक़्त का मंजर
न जाने
रुका हुआ कबसे !
शायर की मज़बूरी
तेरी जुल्फ के साये !
कुछ इस तरह
शाम ढली
न वक़्त रुका
परिंदे लौट गये !
राहों में तेरी
आज भी बिछी
नजरे हमारी
कभी आ जाना
भूले से ही !-०४.०४.२०१६

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