Tuesday, 14 February 2023

तुम जो पुछती हो क्या देखा....

तुम जो पुछती हो क्या देखा
क्या कहुं की क्या देखा
मैंने देखा अपनो को पराया होते
मैंने देखा अपनो को अपनो से लढ़ते
भूल होती है इन्सान से
मैंने देखा इन्सानियत का खून होते
मैंने कहा सोचा था कभी मै तुमसे मिलूंगा
कहा सोचा था तुम मुझसे पुछोगी
मैंने तुममे क्या देखा
मैंने देखा उस खुद को
जो ना जाने किन्हीं गहराईयो छुप गया है
एक बारिश की शाम मिट्टी की सौंधी महक
ढलते सूरज की रोशनी में नहायी दुल्हन सी रात
एक झलक झरने की जो सिमटती है उन आंखों में
ख्वाहिश कहो या आरजू
इल्ज़ाम चाहे जो हो
मुकददर अगर आप हो
मंजूर हर मंजिल !

१३.०२.२०२३

Monday, 22 February 2021

आत्म दर्पण

 बरसों बाद आत्मा से बात हुई

उसने पूछा कहां थे अब तक 

मैंने कहा मंजिल की तलाश में

फिर रुक क्यों गए

रास्ते में  मां जो मिल गई!

Sunday, 22 November 2020

हसरत

 हसरत ना पूछ 

ए ग़ालिब मुझसे

कई मर्तबा देखा 

मैंने 

हौसलों को टूटते

यूं तो हौसला 

बहुत है 

मुझ में 

जिंदगी जीने का

फिर कभी यूं सोचता हूं

अधूरी रहे वह हर हसरत 

जिसमें तुझे ना मांगा हो ।

Sunday, 2 August 2020

नक़ाब

जरूरते बदलती है
वक़्त बदलता है
कही चेहरे तो
कही नक़ाब बदलते है
हैरान न होना
जो कभी न रहु
इंसान की फितरत
वो घर बदलते है
परिंदे कहा आसमान बदलते है !-०२.०८.२०२० 

Thursday, 30 July 2020

मुक़द्दर

वो जो दस्तूर सा था वक़्त का
मुक़द्दर
करार दे बैठे !

रूठे थे हमसे
ऐतबार थे जो !

न सोचा न समझा
वफ़ा का गुनहगार
करार दे बैठे ! - ३०.०७.२०२०


Friday, 17 July 2020

सफ़रनामा

एक राह सी थी
जिसकी मंज़िल न मिली
एक किनारा सा था
कस्ती जहा कस्मकस में थी
मकसद तो यू मंज़िल तक का था
रास्ते रुस्वा थे हमसे
जो हम सफर तय न कर सके !-१७.०७.२०२० 

Thursday, 16 July 2020

मुकम्मल

एक दर्द जो मुकम्मल है
शायर की मानो तो
ज़िन्दगी का आखरी पन्ना
जिसे मौत कहते है
मुकम्मल हो वो हर तलाश
जो तेरे आगोश में सिमट जाऊ !-१७.०७.२०१७