तुम जो पुछती हो क्या देखा
क्या कहुं की क्या देखा
मैंने देखा अपनो को पराया होते
मैंने देखा अपनो को अपनो से लढ़ते
भूल होती है इन्सान से
मैंने देखा इन्सानियत का खून होते
मैंने कहा सोचा था कभी मै तुमसे मिलूंगा
कहा सोचा था तुम मुझसे पुछोगी
मैंने तुममे क्या देखा
मैंने देखा उस खुद को
जो ना जाने किन्हीं गहराईयो छुप गया है
एक बारिश की शाम मिट्टी की सौंधी महक
ढलते सूरज की रोशनी में नहायी दुल्हन सी रात
एक झलक झरने की जो सिमटती है उन आंखों में
ख्वाहिश कहो या आरजू
इल्ज़ाम चाहे जो हो
मुकददर अगर आप हो
मंजूर हर मंजिल !
१३.०२.२०२३
तेरे बिना
तेरे बिना ,हर पल,हर दिन,हर मंजर तेरे बिना !तुझे छूके गुजरे हवाये ;मेरी नजर आज भी तुझे ढूंढे ! हर लम्हा तेरी यादों का कर्जदार रहे ये मेरा दिल ;भुला न पाएंगे तुझे तू याद करे न करे तेरी यादों के सहारे ये जिंदगी बितानी हमने बस इतनी सी ख्वाहिश !मेरे दिल के कुछ चंद अरमान ;कुछ लफ्ज़ कुछ लम्हें जिन्हे शायद वक़्त से पहले कोई न समझ पाया न कभी पायेगा !इस न चीज की नुमाइश आप सब के सामने ,उम्मीद रखता हु आप सब को पसंद आये !
Tuesday, 14 February 2023
Monday, 22 February 2021
आत्म दर्पण
बरसों बाद आत्मा से बात हुई
उसने पूछा कहां थे अब तक
मैंने कहा मंजिल की तलाश में
फिर रुक क्यों गए
रास्ते में मां जो मिल गई!
Sunday, 22 November 2020
हसरत
हसरत ना पूछ
ए ग़ालिब मुझसे
कई मर्तबा देखा
मैंने
हौसलों को टूटते
यूं तो हौसला
बहुत है
मुझ में
जिंदगी जीने का
फिर कभी यूं सोचता हूं
अधूरी रहे वह हर हसरत
जिसमें तुझे ना मांगा हो ।
Sunday, 2 August 2020
नक़ाब
जरूरते बदलती है
वक़्त बदलता है
कही चेहरे तो
कही नक़ाब बदलते है
हैरान न होना
जो कभी न रहु
इंसान की फितरत
वो घर बदलते है
परिंदे कहा आसमान बदलते है !-०२.०८.२०२०
वक़्त बदलता है
कही चेहरे तो
कही नक़ाब बदलते है
हैरान न होना
जो कभी न रहु
इंसान की फितरत
वो घर बदलते है
परिंदे कहा आसमान बदलते है !-०२.०८.२०२०
Thursday, 30 July 2020
मुक़द्दर
वो जो दस्तूर सा था वक़्त का
मुक़द्दर
करार दे बैठे !
रूठे थे हमसे
ऐतबार थे जो !
न सोचा न समझा
वफ़ा का गुनहगार
करार दे बैठे ! - ३०.०७.२०२०
मुक़द्दर
करार दे बैठे !
रूठे थे हमसे
ऐतबार थे जो !
न सोचा न समझा
वफ़ा का गुनहगार
करार दे बैठे ! - ३०.०७.२०२०
Friday, 17 July 2020
सफ़रनामा
एक राह सी थी
जिसकी मंज़िल न मिली
एक किनारा सा था
कस्ती जहा कस्मकस में थी
मकसद तो यू मंज़िल तक का था
रास्ते रुस्वा थे हमसे
जो हम सफर तय न कर सके !-१७.०७.२०२०
जिसकी मंज़िल न मिली
एक किनारा सा था
कस्ती जहा कस्मकस में थी
मकसद तो यू मंज़िल तक का था
रास्ते रुस्वा थे हमसे
जो हम सफर तय न कर सके !-१७.०७.२०२०
Thursday, 16 July 2020
मुकम्मल
एक दर्द जो मुकम्मल है
शायर की मानो तो
ज़िन्दगी का आखरी पन्ना
जिसे मौत कहते है
मुकम्मल हो वो हर तलाश
जो तेरे आगोश में सिमट जाऊ !-१७.०७.२०१७
शायर की मानो तो
ज़िन्दगी का आखरी पन्ना
जिसे मौत कहते है
मुकम्मल हो वो हर तलाश
जो तेरे आगोश में सिमट जाऊ !-१७.०७.२०१७
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