Thursday, 20 August 2015

जीने लगा हूँ ......

कुछ इस अदा से
"जालिम" 
बुलाया उन्होंने 
हमें
न कह सके 

क़तल करे कोई 
इन अदाओं से !
सांसों को जुड़ा करे 
धड़कनो से !
इस बेजुबान दिल की 
जुबान बने कोई !
और इल्जाम हम पे 
की हमने जुल्म ढाये उनपे !

हुजूर 
खता तो बस 
इतनी सी थी हमारी

कह दिया आपने 
हम दिल की बात 
जुबान पर ला न सके !!!-२०। ०८। २०१५

Thursday, 6 August 2015

कुछ लफ्ज़......

कुछ लफ्ज़ यूँ ही 
हमसे भी अर्ज़ करते कभी 
महफ़िल -ए -तमन्ना तो 
हमारे दिल में भी सजती है
इश्क़ और अश्क़ के दरमियान 
एक जिन्दगी 
ख्वाहिशो के कुछ नगमें 
हम भी लिख लेते 
भला शुक्रिया अदा 
करे तो कैसे 
जिस खुदा ने ऐसी 
हसरत दी 
सीने में दिल और 
आँखों में नफरत दी 
फलक पे चाँद तो 
जमीन पे जन्नत दी 
चेहरा हो ऐसा 
माशाल्लाह
किसको फिकर क्या गम 
उसे मौत से क्या डरना 
तेरे सजदे में 
जिसकी इबादत 
क्या परवाह 
छल्ली हो भी जाये सीना 
अबतलक हम करते अदा 
नमाज जिस खुदा को 
आज वो खामी भी 
तुमने करदी पूरी !-०४.. ०८। २०१५