कुछ इस तरह
खफा थे नगमे
हम थे लफ़्ज़ों की
तलाश में
भुला ना सके
जिस मंजर को
न जाने कब
पलके भीगा गयी
हो
लफ्ज़ -ए-बयान
को नामंजूर
कोई
करे भी तो कैसे
वफ़ा का इकरार !-२५.०४.२०१६
खफा थे नगमे
हम थे लफ़्ज़ों की
तलाश में
भुला ना सके
जिस मंजर को
न जाने कब
पलके भीगा गयी
हो
लफ्ज़ -ए-बयान
को नामंजूर
कोई
करे भी तो कैसे
वफ़ा का इकरार !-२५.०४.२०१६
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