हम कलम लिये
हाथ में
कोरा कागज मानो
सवाली !
लिखते रहे
मिटाते रहे
खामोश नजरे बेजुबान !
रूबरू हुए
जो उनसे
मानो शिशे से टकराये !
एक वो दिन था
बिखर गये
फिर वही बरसात !
धुंदली आँखें
ना जाने
कितनी दास्ताएं अनकही !
मुड़ के ना देखा
हमने
जिस राह को !
आज वही आ रुके
उन्ही से मिले
जहा बिछरे थे !-२७.०८.२०१६
हाथ में
कोरा कागज मानो
सवाली !
लिखते रहे
मिटाते रहे
खामोश नजरे बेजुबान !
रूबरू हुए
जो उनसे
मानो शिशे से टकराये !
एक वो दिन था
बिखर गये
फिर वही बरसात !
धुंदली आँखें
ना जाने
कितनी दास्ताएं अनकही !
मुड़ के ना देखा
हमने
जिस राह को !
आज वही आ रुके
उन्ही से मिले
जहा बिछरे थे !-२७.०८.२०१६