Saturday, 27 August 2016

सवाली

हम कलम लिये 
हाथ में 
कोरा कागज मानो 
सवाली !
लिखते रहे 
मिटाते रहे
खामोश नजरे बेजुबान !
रूबरू हुए
जो उनसे
मानो शिशे से टकराये !
एक वो दिन था
बिखर गये
फिर वही बरसात !
धुंदली आँखें
ना जाने
कितनी दास्ताएं अनकही !
मुड़ के ना देखा
हमने
जिस राह को !
आज वही आ रुके
उन्ही से मिले
जहा बिछरे थे !-२७.०८.२०१६

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