तुम जो पुछती हो क्या देखा
क्या कहुं की क्या देखा
मैंने देखा अपनो को पराया होते
मैंने देखा अपनो को अपनो से लढ़ते
भूल होती है इन्सान से
मैंने देखा इन्सानियत का खून होते
मैंने कहा सोचा था कभी मै तुमसे मिलूंगा
कहा सोचा था तुम मुझसे पुछोगी
मैंने तुममे क्या देखा
मैंने देखा उस खुद को
जो ना जाने किन्हीं गहराईयो छुप गया है
एक बारिश की शाम मिट्टी की सौंधी महक
ढलते सूरज की रोशनी में नहायी दुल्हन सी रात
एक झलक झरने की जो सिमटती है उन आंखों में
ख्वाहिश कहो या आरजू
इल्ज़ाम चाहे जो हो
मुकददर अगर आप हो
मंजूर हर मंजिल !
१३.०२.२०२३
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