Tuesday, 29 March 2016

न जाने क्यों ........

ऊजर गए चमन 
बिखर गए सावन 
सड़कों पे अंजान रात 
करे रौशनी से गुफ्तगू !
कोई न जान सके 
अनकहे वो किस्से
किसका है इंतजार
ए दिल-ए-बेक़रार !
वो भूली दास्ताँ
जिसने किया
वफ़ा को मजबूर
कुछ मेरा था
कुछ तुम्हारा
वो हम थे पर
न कुछ था हमारा !
थी बंदिशे जो
थी जुस्तुजू वो
न हो पाई बयांन
कितने दफे यूँ ही
आज भी हम
यादें तलाशते
न जाने क्यों !!!
गुजर गयी
कई रातें यूँ ही
आज भी गुजर जाएगी
तन्हाइयो की महफ़िल सजेगी
फिर से वफ़ा
आंसू बहायेगी
न जाने क्यों !!!
बाहार आते रहे
चले गुलशन का कारोबार
गिरते अश्को को
न मिल पाए मजधार !
दरिया ढूंढा सारा
न मिला किनारा
न जाने क्यों !!! - ३०.०३.२०१६

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