Thursday, 9 May 2013

बेवफा महबूबा


जिंदगी ज़हर पीने नहीं देती 
मौत जालिम जीने नहीं देती!
ये तो तेरे इश्क का क़र्ज़ है 
वरना इस बेवफा की तमन्ना! 
हमें ना होती 
खुदखुसी कर लेते!
मार डालते खुद को ही हम
तेरे सिवा!
इस ज़िन्दगी ने 
हमको दिया ही क्या है!
बस तेरी ही ख्वाहिश है 
जो इस बेवफा को भी  
हमने महबूबा बना लिया है!-रचित ० १ .१ १ .२ ० १ २

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